Sunday, 24 September 2017

Nazar - Mystic eyesight

It was yet another normal day when I went to a doctor for routine check-up of my eyesight. The doctor passed a judgement! While I had gone to her for a better eyesight, she triggered a psychological turmoil. The visit not just stirred some emotions but also agitated the almost solidified ink of my pen which had otherwise succumbed to the daily din of  mundane matters. I stood puzzled at the doctor's remarks, trying to unfolded the mysticism behind my eyes, as my thoughts transformed into a rhythmic composition...

नज़र
“आपको चश्मा पह्नना होगा”
डाक्टर कहते हैं, “आपकी नज़र कमज़ोर है”


मैं तर्क् करता हूँ, दलील देता हूँ
“मुझे तो मीलों दूर सूरज यूं ही दिख जाता है”  
मुझे घूरते, गुस्से से समझाते 
“तेरी आंखों का पर्दा खराब है  
उस पर सही तस्वीर नहीं बनती”   


मैं फिर बहस करता “डाक्टर साहिब,
आँखें खराब होना क्या नज़र खराब होना है ?
वो ग्रंथ लिखने वाले होमेर की भी
क्या नज़र कमज़ोर थी?”


नज़र तो आँखों से नहीं, जिगर से है उभरती
आपकी स्क्रीनों से नहीं, मेरे सपनों से है सँवरती


आपके इलाज से नहीं , मेरे परवाज़ से है बहती
बेजान बोतलों में बंद दवाइयों से नहीं
आपकी सुइयों और सलाइयों से नहीं 
ये ग्रंथ पढ़ने या भाषण सुनने से नहीं

नज़र के लिये लाज़मी है, एक आग का होना
क्योंकि
नज़र आँखों से नहीं, दिल से है उभरती
आपकी सक्रीनों से नहीं, मेरे सपनों से है सँवरती


आप तो सिगरेट पी कर,
अँगारों को पाँव तले कुचल देते हो
मैं उसी आग को
हाथों में पकड़
जिगर से हूँ लगाता
अपनी छाती पर पड़े
नाखूनों के निशान
कतरा‌‌ ‌- कतरा हूँ मिटाता

आप उस आग को धुएँ में उड़ाते हो
मैं उसकी गर्मी से भाप हूँ बनाता
अपने रोम रोम को उस से हूँ नहलाता

आप डाक्टर हैं, आप काबिल हैं
आप आग से बचाने के लिये मेरा हाथ खींचते हैं
पर इन हाथों में अजब एक फितूर है
दुनिया के हर रिश्ते का शामिल इनमें गुरूर है

हर सुबह जब मेरी नन्ही, चंचल खुशी
अपनी पँखुरी सी उंगलियों से
मेरे गालों को है सहलाती
तो
हाथ बढ़ाने की यह फितरत
कहाँ तक है रुक पाती ?

इन हाथों में वाकई अजब इक फितूर है
जिगर पे हाथ, हाथ पे अँगार,
जिगर से लहू, अँगार से भाप
देता मेरी नज़र को नया रंग, नया नूर है


भाप की सफेदी, लहू की लाली से मिल
मेरे हर अंग में नया रंग है भरती
मेरे हर अंग में नया रंग है भरती

डाक्टर साहिब,
नज़र तो आँखों से नहीं, जिगर से है उभरती
आपकी सक्रीनों से नहीं, मेरे सपनों से है सँवरती
आपकी सक्रीनों से नहीं, मेरे सपनों से है सँवरती.......


.....अमित